📿 श्लोक संग्रह

तेजः क्षमा धृतिः शौचम्

गीता 16.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
तेजः
तेज, प्रभाव
क्षमा
क्षमा करना
धृतिः
धैर्य
शौचम्
बाहर-भीतर की शुचिता
अद्रोहः
किसी से द्रोह न करना
न अतिमानिता
अत्यधिक मान न चाहना
भवन्ति
होते हैं
सम्पदम्
सम्पत्ति (गुण)
दैवीम्
दैवी (देवताओं जैसी)
अभिजातस्य
जन्मे हुए पुरुष की
भारत
हे अर्जुन

दैवी गुणों की सूची यहाँ पूरी होती है। तेज — भीतर का आत्मिक बल जो चेहरे पर चमकता है। क्षमा — जो अपराध करे उसे माफ़ कर देना। धृति — कठिन समय में भी धैर्य बनाए रखना।

शौच — शरीर और मन दोनों की स्वच्छता। अद्रोह — किसी के प्रति छल या शत्रुता न रखना। नातिमानिता — अपने बारे में ज़रूरत से ज़्यादा ऊँचा न सोचना।

भगवान कहते हैं — हे अर्जुन! जो व्यक्ति दैवी स्वभाव लेकर जन्मा है, उसमें ये सभी गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं। ये गुण जन्म से भी आते हैं और अभ्यास से भी बढ़ाए जा सकते हैं।

श्लोक 16.1 से 16.3 तक दैवी सम्पदा के छब्बीस गुण गिनाए गए हैं। यह सूची किसी भी साधक के लिए आत्म-मूल्यांकन का आधार बन सकती है — अपने गुणों को जाँचने का एक दर्पण।

"अभिजातस्य" शब्द बताता है कि ये गुण संस्कारों से आते हैं — पूर्वजन्म और इस जन्म के अच्छे कर्मों से।

अध्याय 16 · 3 / 24
← पिछला अध्याय 16 · 3 / 24 अगला →