📿 श्लोक संग्रह

त्रिविधं नरकस्येदम्

गीता 16.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
त्रिविधम्
तीन प्रकार का
नरकस्य
नरक का
इदम्
यह
द्वारम्
द्वार (दरवाज़ा)
नाशनम्
नाश करने वाला
आत्मनः
आत्मा का
कामः
काम (वासना)
क्रोधः
क्रोध
तथा
और
लोभः
लालच
तस्मात्
इसलिए
एतत् त्रयम्
इन तीनों को
त्यजेत्
त्याग दे

यह इस अध्याय का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण श्लोक है। भगवान स्पष्ट कहते हैं — नरक के तीन दरवाज़े हैं: काम (वासना), क्रोध और लोभ। ये तीनों आत्मा का नाश करने वाले हैं।

काम — कभी न तृप्त होने वाली इच्छा। क्रोध — जब इच्छा पूरी न हो तो उत्पन्न होने वाला आक्रोश। लोभ — "और चाहिए, और चाहिए" की अंतहीन भूख। ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं — काम से क्रोध आता है, और लोभ काम को बढ़ाता है।

इसलिए भगवान कहते हैं — "तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्" — इन तीनों को छोड़ दो। यह सीधी, स्पष्ट आज्ञा है — कोई पेचीदगी नहीं। बस इन तीनों से बचो और नरक का द्वार बंद हो जाएगा।

गीता 3.37 में भी भगवान ने काम और क्रोध को महान शत्रु बताया था। यहाँ उसमें लोभ भी जोड़कर ये तीनों मिलकर "नरक के तीन द्वार" कहे गए हैं। यह अध्याय का सार-वचन है।

यह श्लोक अध्याय में एक मोड़ है — अब तक आसुरी गुणों का वर्णन था, अब समाधान शुरू होता है। आगे के श्लोकों में शास्त्र-अनुसार आचरण का उपदेश दिया गया है।

अध्याय 16 · 21 / 24
← पिछला अध्याय 16 · 21 / 24 अगला →