भगवान कहते हैं — ये मूढ़ लोग जन्म-जन्म में आसुरी योनि पाते रहते हैं। एक जन्म में आसुरी कर्म किए, अगले जन्म में फिर आसुरी योनि मिली, फिर वही कर्म, फिर वही योनि — यह एक दुष्चक्र है जिसमें ये लोग फँसते जाते हैं।
"मामप्राप्यैव" — मुझे (भगवान को) बिना पाए ही। ये लोग भगवान तक कभी पहुँच ही नहीं पाते। जो सबसे बड़ा लक्ष्य है — परमात्मा की प्राप्ति — वह इन्हें कभी नहीं मिलता।
और फिर ये "अधमां गतिम्" — सबसे नीची गति को प्राप्त होते हैं। यह अध्याय का सबसे गम्भीर चेतावनी-वचन है।