📿 श्लोक संग्रह

आसुरीं योनिमापन्नाः

गीता 16.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥
आसुरीम्
आसुरी
योनिम्
योनि को
आपन्नाः
प्राप्त होकर
मूढाः
मूर्ख
जन्मनि जन्मनि
जन्म-जन्म में
माम्
मुझे
अप्राप्य
न पाकर
एव
ही
कौन्तेय
हे अर्जुन
ततः
उसके बाद
यान्ति
जाते हैं
अधमाम् गतिम्
सबसे नीचे की गति

भगवान कहते हैं — ये मूढ़ लोग जन्म-जन्म में आसुरी योनि पाते रहते हैं। एक जन्म में आसुरी कर्म किए, अगले जन्म में फिर आसुरी योनि मिली, फिर वही कर्म, फिर वही योनि — यह एक दुष्चक्र है जिसमें ये लोग फँसते जाते हैं।

"मामप्राप्यैव" — मुझे (भगवान को) बिना पाए ही। ये लोग भगवान तक कभी पहुँच ही नहीं पाते। जो सबसे बड़ा लक्ष्य है — परमात्मा की प्राप्ति — वह इन्हें कभी नहीं मिलता।

और फिर ये "अधमां गतिम्" — सबसे नीची गति को प्राप्त होते हैं। यह अध्याय का सबसे गम्भीर चेतावनी-वचन है।

यह श्लोक पिछले श्लोक (16.19) को पूरा करता है। वहाँ भगवान ने कहा कि मैं उन्हें आसुरी योनियों में डालता हूँ, यहाँ बताया कि वे फिर कभी भगवान तक नहीं पहुँच पाते।

"जन्मनि जन्मनि" — यह दोहराव इस बात को और गहरा बनाता है। यह कोई एक जन्म की सज़ा नहीं — यह जन्म-जन्म का चक्र है। इसीलिए भगवान अगले श्लोक में उपाय बताते हैं।

अध्याय 16 · 20 / 24
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