📿 श्लोक संग्रह

ध्यायतो विषयान्पुंसः

गीता 2.62 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
ध्यायतः
चिंतन करते हुए
विषयान्
विषयों का (इन्द्रिय भोगों का)
पुंसः
पुरुष को
सङ्गः
आसक्ति
तेषु
उनमें
उपजायते
उत्पन्न होती है
सङ्गात्
आसक्ति से
सञ्जायते
उत्पन्न होती है
कामः
कामना, इच्छा
कामात्
कामना से
क्रोधः
क्रोध
अभिजायते
उत्पन्न होता है

इस श्लोक में पतन की सीढ़ियाँ बताई गई हैं। पहले मनुष्य किसी विषय (चीज़ या भोग) के बारे में बार-बार सोचता है। बार-बार सोचने से उसमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से तीव्र इच्छा (काम) पैदा होती है। और जब इच्छा पूरी नहीं होती, तो क्रोध आता है।

इसे ऐसे समझो — एक बच्चे ने दुकान में एक खिलौना देखा। पहले बस देखा, फिर उसके बारे में सोचने लगा, फिर उसकी इच्छा तीव्र हो गई, और जब नहीं मिला तो रोने लगा, ज़िद करने लगा। यही क्रम बड़ों में भी चलता है, बस विषय बदल जाते हैं।

कृष्ण यहाँ एक मनोवैज्ञानिक सत्य बता रहे हैं जो हज़ारों साल पहले भी सच था और आज भी सच है। मन पर नियंत्रण न हो तो विचारों की एक शृंखला बन जाती है जो मनुष्य को नीचे खींचती चली जाती है।

यह श्लोक गीता के दूसरे अध्याय के अंतिम भाग से है जहाँ कृष्ण स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) पुरुष का वर्णन करते हैं। अगला श्लोक (2.63) इसी शृंखला को आगे बढ़ाता है — क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रंश, और अंत में बुद्धि का नाश।

ये दो श्लोक (2.62-63) मिलकर मानसिक पतन का पूरा चित्र प्रस्तुत करते हैं और परंपरा में इन्हें एक साथ याद किया जाता रहा है।

अध्याय 2 · 62 / 72
अध्याय 2 · 62 / 72 अगला →