यह श्लोक पिछले श्लोक (2.62) की शृंखला को आगे बढ़ाता है। वहाँ बताया गया था कि विषयों के चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से काम, और काम से क्रोध पैदा होता है। अब यहाँ बताया गया है कि क्रोध के बाद क्या होता है।
क्रोध से सम्मोह (भ्रम) आता है — जब गुस्सा आता है तो सही-ग़लत की समझ खो जाती है। फिर स्मृति भ्रष्ट होती है — मनुष्य भूल जाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। फिर बुद्धि नष्ट हो जाती है — और जब बुद्धि ही चली गई तो मनुष्य पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
जैसे एक पेड़ की जड़ में दीमक लग जाए तो धीरे-धीरे पूरा पेड़ गिर जाता है — वैसे ही विषयों का चिंतन एक छोटी सी दीमक है जो अंत में पूरे मनुष्य को गिरा देती है। यह श्लोक एक चेतावनी है — मन पर नियंत्रण रखना कितना ज़रूरी है।