कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) से मुक्त, अपनी इंद्रियों को वश में रखते हुए विषयों में विचरण करता है, वह प्रसाद (अंतरिक शांति) प्राप्त करता है।
यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि कृष्ण विषयों से भागने को नहीं कह रहे। वे कह रहे हैं — संसार में रहो, विषयों का उपभोग करो, लेकिन न उनसे चिपको (राग) और न उनसे घृणा करो (द्वेष)। बस इतनी सी बात।
जैसे पानी में कमल का पत्ता — पानी में रहता है लेकिन भीगता नहीं। वैसे ही संसार में रहो लेकिन संसार चिपके नहीं।