📿 श्लोक संग्रह

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय

गीता 16.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥
एतैः
इन
विमुक्तः
मुक्त हुआ
कौन्तेय
हे अर्जुन
तमोद्वारैः
अन्धकार के द्वारों से
त्रिभिः
तीनों
नरः
मनुष्य
आचरति
आचरण करता है
आत्मनः
अपना
श्रेयः
कल्याण
ततः
उसके बाद
याति
प्राप्त होता है
पराम् गतिम्
परम गति (मोक्ष)

पिछले श्लोक में चेतावनी थी, इस श्लोक में आशा है। भगवान कहते हैं — हे अर्जुन! जो मनुष्य इन तीनों अन्धकार के दरवाज़ों (काम, क्रोध, लोभ) से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है।

"तमोद्वारैः" — भगवान इन्हें "अन्धकार के द्वार" कहते हैं। काम, क्रोध और लोभ — ये तीनों अन्धकार (तमस) में ले जाते हैं। इनसे मुक्त होना प्रकाश की ओर जाना है।

और फिर ऐसा व्यक्ति "परां गतिम्" — परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है। यह बहुत सकारात्मक संदेश है — समस्या गम्भीर है, पर समाधान सम्भव है। बस इन तीनों को छोड़ो और कल्याण का मार्ग खुल जाएगा।

यह श्लोक 16.21 का विपरीत पक्ष है — वहाँ नरक का द्वार बताया, यहाँ मोक्ष का मार्ग। दोनों श्लोक मिलकर एक पूरा सन्देश देते हैं: काम-क्रोध-लोभ छोड़ो = मोक्ष, पकड़ो = नरक।

"आचरत्यात्मनः श्रेयः" — अपना कल्याण स्वयं करता है। भगवान बताते हैं कि मुक्ति दूसरे नहीं दिला सकते — स्वयं को इन तीन दोषों से मुक्त करना होगा।

अध्याय 16 · 22 / 24
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