📿 श्लोक संग्रह

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते

गीता 16.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥
तस्मात्
इसलिए
शास्त्रम्
शास्त्र
प्रमाणम्
प्रमाण (आधार)
ते
तुम्हारा
कार्याकार्यव्यवस्थितौ
क्या करें-क्या न करें इसमें
ज्ञात्वा
जानकर
शास्त्रविधानोक्तम्
शास्त्र-विधान द्वारा कहा गया
कर्म
कर्म
कर्तुम्
करने के लिए
इह
यहाँ (इस संसार में)
अर्हसि
तुम्हें चाहिए

यह सोलहवें अध्याय का अंतिम श्लोक है और पूरे अध्याय का सार एक वाक्य में है: शास्त्र को अपना प्रमाण (आधार) मानो।

भगवान कहते हैं — क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसका निर्णय शास्त्र के आधार पर करो। मनमानी नहीं, मन की इच्छा से नहीं — शास्त्र की विधि जो कहे, उसके अनुसार कर्म करो।

"ज्ञात्वा" — पहले जानो, समझो, फिर करो। भगवान अंधी श्रद्धा नहीं कह रहे — वे कह रहे हैं कि शास्त्र को जानो, उसकी विधि समझो, और फिर उसके अनुसार कर्म करो। यह बुद्धिपूर्ण श्रद्धा है।

इस श्लोक से सोलहवाँ अध्याय "दैवासुरसम्पद्विभागयोग" पूर्ण होता है। अध्याय का सार यह है: दैवी गुण अपनाओ (श्लोक 1-3), आसुरी गुणों से बचो (श्लोक 4-20), काम-क्रोध-लोभ त्यागो (श्लोक 21), और शास्त्र को मार्गदर्शक मानो (श्लोक 23-24)।

अगला अध्याय (17 — श्रद्धात्रयविभागयोग) इसी बात को आगे बढ़ाता है — श्रद्धा कैसी होनी चाहिए, यह विस्तार से बताता है।

अध्याय 16 · 24 / 24
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