📿 श्लोक संग्रह

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य

गीता 17.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥
ये
जो लोग
शास्त्रविधिम्
शास्त्र की विधि को
उत्सृज्य
त्यागकर
यजन्ते
पूजा करते हैं
श्रद्धया
श्रद्धा से
अन्विताः
युक्त
तेषाम्
उनकी
निष्ठा
स्थिति / श्रद्धा
का
कैसी
सत्त्वम्
सात्त्विक
रजः
राजसिक
तमः
तामसिक

यह सत्रहवें अध्याय का पहला श्लोक है। अर्जुन यहाँ भगवान कृष्ण से एक बहुत सुंदर प्रश्न पूछते हैं — जो लोग शास्त्रों में बताई गई विधि को छोड़कर, फिर भी मन में पूरी श्रद्धा रखते हुए पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कैसी मानी जाए? क्या उनकी श्रद्धा सात्त्विक है, राजसिक है, या तामसिक?

अर्जुन का यह प्रश्न हम सबके मन में भी उठता है। बहुत-से लोग मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं — लेकिन शास्त्रों में बताई गई सटीक विधि उन्हें पता नहीं होती। फिर भी उनके मन में गहरी आस्था होती है। ऐसे लोगों की श्रद्धा किस श्रेणी में आती है — यही अर्जुन जानना चाहते हैं।

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके उत्तर में भगवान कृष्ण पूरे अध्याय में श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान — सबको तीन गुणों के आधार पर बाँटकर समझाते हैं।

सोलहवें अध्याय के अंत में भगवान ने शास्त्र-विधि के अनुसार आचरण करने पर बल दिया था। अर्जुन का यह प्रश्न उसी बात को आगे बढ़ाता है — यदि कोई शास्त्र-विधि नहीं जानता, पर श्रद्धा रखता है, तो उसका क्या होगा?

यह प्रश्न पूरे श्रद्धात्रयविभागयोग अध्याय की नींव है। भगवान कृष्ण इसके उत्तर में त्रिगुणात्मक श्रद्धा का विस्तृत वर्णन करते हैं।

अध्याय 17 · 1 / 28
अध्याय 17 · 1 / 28 अगला →