📿 श्लोक संग्रह

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य

गीता 16.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
यः
जो
शास्त्रविधिम्
शास्त्र की विधि को
उत्सृज्य
छोड़कर
वर्तते
आचरण करता है
कामकारतः
अपनी इच्छा से
न सः
वह नहीं
सिद्धिम्
सिद्धि
अवाप्नोति
प्राप्त करता
न सुखम्
न सुख
न पराम् गतिम्
न परम गति

भगवान कहते हैं — जो व्यक्ति शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी मनमानी करता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख, न परम गति (मोक्ष)। तीनों चीज़ें गँवा देता है।

"कामकारतः" — अपनी इच्छा से, मनमाने ढंग से। जैसे कोई बिना नक्शे के अनजान रास्ते पर चल पड़े — वह भटकेगा ही। शास्त्र वह नक्शा है जो हमें सही दिशा दिखाता है।

ध्यान दीजिए — भगवान तीन बार "न" कहते हैं: न सिद्धि, न सुख, न परम गति। यह बहुत कड़ा कथन है। मनमानी का रास्ता कहीं नहीं पहुँचाता — न इस लोक में सुख देता है, न परलोक में।

यह श्लोक शास्त्र-प्रामाण्य (शास्त्र की प्रमाणिकता) पर बल देता है। भारतीय परंपरा में शास्त्र केवल पुस्तकें नहीं — ये पीढ़ियों का अनुभव-ज्ञान हैं, ऋषियों की तपस्या का फल हैं।

अगला श्लोक (16.24) इसी बात को आगे बढ़ाते हुए अध्याय का उपसंहार करता है।

अध्याय 16 · 23 / 24
← पिछला अध्याय 16 · 23 / 24 अगला →