📿 श्लोक संग्रह

तानहं द्विषतः क्रूरान्

गीता 16.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥
तान्
उन
अहम्
मैं
द्विषतः
द्वेष करने वालों को
क्रूरान्
क्रूर
संसारेषु
संसार के चक्र में
नराधमान्
मनुष्यों में सबसे नीच
क्षिपामि
डालता हूँ
अजस्रम्
बार-बार
अशुभान्
अशुभ (पापी)
आसुरीषु योनिषु
आसुरी योनियों में

अब भगवान स्वयं बताते हैं कि ऐसे लोगों का क्या होता है। "तानहम्" — उन लोगों को मैं स्वयं... यह भगवान के मुख से कठोर वचन हैं, पर यह न्याय है, क्रूरता नहीं।

जो लोग द्वेष करने वाले, क्रूर और नराधम (मनुष्यों में सबसे नीच) हैं — उन्हें भगवान बार-बार आसुरी योनियों में डालते हैं। "अजस्रम्" — निरंतर, बार-बार। यह कोई एक बार का दण्ड नहीं — यह चक्र है।

यह समझना जरूरी है कि भगवान किसी से बदला नहीं लेते। यह कर्म का स्वाभाविक फल है — जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। आसुरी कर्म करने वाले को आसुरी योनि मिलती है — यह प्रकृति का नियम है।

यह गीता के सबसे कठोर श्लोकों में से एक है। भगवान "नराधमान्" (मनुष्यों में सबसे नीच) जैसे कड़े शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं — यह दर्शाता है कि भगवद्-द्वेष और क्रूरता कितने गम्भीर दोष हैं।

पर इसमें भी करुणा छिपी है — यह चेतावनी इसलिए दी गई है कि लोग सावधान हों और आसुरी मार्ग से बचें।

अध्याय 16 · 19 / 24
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