📿 श्लोक संग्रह

अहङ्कारं बलं दर्पम्

गीता 16.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥
अहङ्कारम्
अहंकार
बलम्
बल
दर्पम्
घमंड
कामम्
कामना
क्रोधम्
क्रोध
संश्रिताः
आश्रय लिए हुए
माम्
मुझ (भगवान) से
आत्मपरदेहेषु
अपने और दूसरों के शरीर में
प्रद्विषन्तः
द्वेष करने वाले
अभ्यसूयकाः
दोष लगाने वाले

अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोध — इन पाँचों का सहारा लेकर ये आसुरी लोग जीते हैं। ये पाँचों मिलकर एक विषैला मिश्रण बनाते हैं जो व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देता है।

सबसे गम्भीर बात — ये लोग भगवान से द्वेष करते हैं। "मामात्मपरदेहेषु" — भगवान सबके हृदय में बैठे हैं (अपने शरीर में भी, दूसरों के शरीर में भी) — और ये लोग उस भगवान से ही घृणा करते हैं।

"अभ्यसूयकाः" — ये दोष लगाने वाले होते हैं। जो भी अच्छा करे, उसमें भी दोष ढूँढ लेते हैं। भगवान के कर्मों में भी गलती निकालते हैं। यह द्वेष और ईर्ष्या का चरम है।

यह श्लोक आसुरी स्वभाव का सबसे गहरा दोष बताता है — भगवद्-द्वेष। अहंकार, काम, क्रोध — ये सब दोष हैं, पर भगवान से द्वेष सबसे बड़ा पतन है।

अगले श्लोक में इसी का दण्ड बताया गया है — ऐसे लोगों को भगवान बार-बार आसुरी योनियों में डालते हैं।

अध्याय 16 · 18 / 24
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