अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोध — इन पाँचों का सहारा लेकर ये आसुरी लोग जीते हैं। ये पाँचों मिलकर एक विषैला मिश्रण बनाते हैं जो व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देता है।
सबसे गम्भीर बात — ये लोग भगवान से द्वेष करते हैं। "मामात्मपरदेहेषु" — भगवान सबके हृदय में बैठे हैं (अपने शरीर में भी, दूसरों के शरीर में भी) — और ये लोग उस भगवान से ही घृणा करते हैं।
"अभ्यसूयकाः" — ये दोष लगाने वाले होते हैं। जो भी अच्छा करे, उसमें भी दोष ढूँढ लेते हैं। भगवान के कर्मों में भी गलती निकालते हैं। यह द्वेष और ईर्ष्या का चरम है।