📿 श्लोक संग्रह

काममाश्रित्य दुष्पूरम्

गीता 16.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥
कामम्
कामना को
आश्रित्य
सहारा लेकर
दुष्पूरम्
जो कभी पूरी न हो
दम्भ
पाखंड
मान
मान (गर्व)
मदान्विताः
मद से युक्त
मोहात्
मोह के कारण
गृहीत्वा
ग्रहण करके
असद्ग्राहान्
मिथ्या सिद्धान्तों को
प्रवर्तन्ते
प्रवृत्त होते हैं
अशुचिव्रताः
अशुद्ध आचरण वाले

आसुरी लोग ऐसी कामनाओं का सहारा लेते हैं जो कभी पूरी नहीं होतीं। जैसे समुद्र में कितना भी पानी डालो, वह नहीं भरता — वैसे ही इन लोगों की इच्छाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं।

ये लोग दम्भ (दिखावे), मान (अहंकार) और मद (नशे) से भरे होते हैं। मोह के कारण वे गलत सिद्धान्तों को अपना लेते हैं — जैसे "बस यही जीवन है, खाओ-पीओ मौज करो।"

"अशुचिव्रताः" — इनके व्रत (संकल्प) ही अशुद्ध होते हैं। ये जो भी करने की ठानते हैं, वह दूसरों के लिए हानिकारक होता है। इनका पूरा जीवन अपवित्र आचरण पर टिका होता है।

"दुष्पूरम्" (जो कभी न भरे) — यह शब्द कामना की प्रकृति बहुत सटीक बताता है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी उत्पन्न हो जाती है — यह अन्तहीन चक्र है।

श्लोक 16.8-12 में आसुरी जीवन-दृष्टि का एक पूरा चित्र उभरता है — गलत विचार → गलत इच्छाएँ → गलत कर्म → दुख।

अध्याय 16 · 10 / 24
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