जब भीतर की आसक्ति रूपी जड़ कट जाए, तब क्या करें? श्रीकृष्ण कहते हैं — उस पद को खोजो जहाँ जाने के बाद फिर इस संसार-चक्र में नहीं लौटना पड़ता। यह कोई दूर का देश नहीं है — यह भीतर का एक ठहराव है।
और वहाँ कैसे पहुँचें? एक ही रास्ता — उस आदि पुरुष की शरण। जिस ईश्वर से यह सारी सृष्टि निकली है, जो सबसे पहले था — उसकी शरण लो।
दादा-दादी अक्सर कहते हैं — 'बेटा, उसी के पास जाओ जिसने तुम्हें बनाया।' यह श्लोक यही कहता है — शरण जाओ उसकी जो सबका मूल है।