📿 श्लोक संग्रह

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्

गीता 15.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
ततः
उसके बाद (वृक्ष काटने के बाद)
पदम् तत्
उस पद को
परिमार्गितव्यम्
खोजना चाहिए
यस्मिन् गताः
जहाँ जाने पर
न निवर्तन्ति भूयः
फिर वापस नहीं लौटते
तम् एव
उसी को
आद्यम् पुरुषम्
आदि पुरुष को
प्रपद्ये
शरण जाता हूँ
यतः
जिससे
प्रवृत्तिः
सृष्टि की गति
प्रसृता पुराणी
प्राचीन काल से फैली है

जब भीतर की आसक्ति रूपी जड़ कट जाए, तब क्या करें? श्रीकृष्ण कहते हैं — उस पद को खोजो जहाँ जाने के बाद फिर इस संसार-चक्र में नहीं लौटना पड़ता। यह कोई दूर का देश नहीं है — यह भीतर का एक ठहराव है।

और वहाँ कैसे पहुँचें? एक ही रास्ता — उस आदि पुरुष की शरण। जिस ईश्वर से यह सारी सृष्टि निकली है, जो सबसे पहले था — उसकी शरण लो।

दादा-दादी अक्सर कहते हैं — 'बेटा, उसी के पास जाओ जिसने तुम्हें बनाया।' यह श्लोक यही कहता है — शरण जाओ उसकी जो सबका मूल है।

15.3 में वृक्ष काटने का उपाय था। 15.4 में उसके बाद का लक्ष्य बताया गया है — वह पद जहाँ से वापसी नहीं। यह दो श्लोक मिलकर एक पूर्ण उपदेश बनाते हैं: पहले बंधन काटो, फिर लक्ष्य की ओर चलो।

परंपरा में 'यस्मिन् गता न निवर्तन्ति' — यह वाक्यांश मोक्ष की परिभाषा के रूप में उद्धृत होता रहा है। 'आद्यं पुरुषं प्रपद्ये' — यह प्रपत्ति (शरण) के भाव का सुंदर उदाहरण है।

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