अब श्रीकृष्ण स्वयं अपने नाम की सार्थकता बताते हैं। मैं क्षर (नश्वर) से परे हूँ — इसलिए क्षर नहीं। और अक्षर (अविनाशी) से भी उत्तम हूँ — इसलिए केवल अक्षर भी नहीं। दोनों से ऊपर — इसीलिए 'पुरुषोत्तम'।
यह नाम लोक में भी प्रसिद्ध है और वेद में भी। जैसे किसी परिवार का सबसे बड़ा और सबसे प्रिय व्यक्ति होता है जिसे सब मान देते हैं — वैसे ही तीनों तत्वों में यह परमात्मा सर्वोपरि है।
यह श्लोक एक प्रकार से त्रयी का उपसंहार है। क्षर जाना, अक्षर जाना, और अब जाना कि इन दोनों से परे परमात्मा है — और वही पुरुषोत्तम है।