एक ही घटना — कोई जन्मता है, जीता है, मरता है। मूढ़ उसे केवल शरीर की घटना मानता है — बस। ज्ञानी उसी घटना में देखता है — जीव का आना, रहना, जाना; गुणों का खेल; भीतर की चेतना का सफ़र।
जैसे बादलों में बिजली चमकती है — जो देखना जानता है वह कहेगा 'देखो, कैसे जल-कण टकराए।' जो नहीं जानता वह बस चौंक जाएगा। एक ही बिजली, दो दृष्टियाँ।
'ज्ञानचक्षुः' — ज्ञान की आँख। यह आँख दो कोटर में नहीं है, भीतर है। इसे खोलने के लिए विवेक चाहिए।