📿 श्लोक संग्रह

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि

गीता 15.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥
उत्क्रामन्तम्
शरीर छोड़ते हुए को
स्थितम् वापि
या शरीर में रहते हुए को
भुञ्जानम् वा
या भोग करते हुए को
गुणान्वितम्
गुणों से युक्त
विमूढाः
मूढ़ लोग
न अनुपश्यन्ति
नहीं देख पाते
पश्यन्ति
देखते हैं
ज्ञानचक्षुषः
ज्ञान-चक्षु वाले

एक ही घटना — कोई जन्मता है, जीता है, मरता है। मूढ़ उसे केवल शरीर की घटना मानता है — बस। ज्ञानी उसी घटना में देखता है — जीव का आना, रहना, जाना; गुणों का खेल; भीतर की चेतना का सफ़र।

जैसे बादलों में बिजली चमकती है — जो देखना जानता है वह कहेगा 'देखो, कैसे जल-कण टकराए।' जो नहीं जानता वह बस चौंक जाएगा। एक ही बिजली, दो दृष्टियाँ।

'ज्ञानचक्षुः' — ज्ञान की आँख। यह आँख दो कोटर में नहीं है, भीतर है। इसे खोलने के लिए विवेक चाहिए।

15.10 'मूढ़' और 'ज्ञानी' का भेद स्थापित करता है जो आगे 15.11 में और स्पष्ट होगा। यह श्लोक 15.7-9 के जीव-वर्णन का उपसंहार है।

परंपरा में 'ज्ञानचक्षुः' पद को विवेक-दृष्टि का पर्याय माना जाता रहा है। यह वही दृष्टि है जिसका वर्णन गीता 13.34 में भी है।

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