📿 श्लोक संग्रह

सत्त्वं रजस्तम इति

गीता 14.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
सत्त्वम्
सत्त्वगुण
रजः
रजोगुण
तमः
तमोगुण
इति
ये
गुणाः
गुण
प्रकृतिसम्भवाः
प्रकृति से उत्पन्न
निबध्नन्ति
बाँधते हैं
महाबाहो
हे महाबाहु
देहे
शरीर में
देहिनम्
आत्मा को
अव्ययम्
अविनाशी

यह इस अध्याय का मुख्य श्लोक है। भगवान कहते हैं — हे महाबाहु अर्जुन, सत्त्व, रजस् और तमस् — ये तीन गुण प्रकृति से पैदा होते हैं। ये अविनाशी आत्मा को शरीर में बाँध देते हैं।

इसे ऐसे समझो — जैसे तीन रस्सियों से किसी को बाँधा जाए, वैसे ही ये तीन गुण आत्मा को संसार में बाँधे रखते हैं। सत्त्व सफेद रस्सी है (सुख और ज्ञान से बाँधता है), रजस् लाल रस्सी है (इच्छा और कर्म से बाँधता है), और तमस् काली रस्सी है (अज्ञान और आलस्य से बाँधता है)।

ध्यान दें — आत्मा स्वयं अव्यय (अविनाशी) है, फिर भी ये गुण उसे बाँधे रखते हैं। यह बन्धन वास्तविक नहीं, अज्ञान के कारण प्रतीत होने वाला है।

यह श्लोक पूरे अध्याय की नींव है। आगे के श्लोकों में भगवान एक-एक गुण को विस्तार से समझाएँगे — सत्त्व (14.6), रजस् (14.7), और तमस् (14.8)।

सांख्य दर्शन में त्रिगुण का सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद, योग और भारतीय मनोविज्ञान — सभी इन तीन गुणों के आधार पर मनुष्य के स्वभाव को समझते हैं।

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