यह इस अध्याय का मुख्य श्लोक है। भगवान कहते हैं — हे महाबाहु अर्जुन, सत्त्व, रजस् और तमस् — ये तीन गुण प्रकृति से पैदा होते हैं। ये अविनाशी आत्मा को शरीर में बाँध देते हैं।
इसे ऐसे समझो — जैसे तीन रस्सियों से किसी को बाँधा जाए, वैसे ही ये तीन गुण आत्मा को संसार में बाँधे रखते हैं। सत्त्व सफेद रस्सी है (सुख और ज्ञान से बाँधता है), रजस् लाल रस्सी है (इच्छा और कर्म से बाँधता है), और तमस् काली रस्सी है (अज्ञान और आलस्य से बाँधता है)।
ध्यान दें — आत्मा स्वयं अव्यय (अविनाशी) है, फिर भी ये गुण उसे बाँधे रखते हैं। यह बन्धन वास्तविक नहीं, अज्ञान के कारण प्रतीत होने वाला है।