हे कुन्तीपुत्र अर्जुन, सब योनियों में जितने भी शरीर उत्पन्न होते हैं — चाहे मनुष्य हों, पशु हों, पक्षी हों या कीट — उन सबकी माता प्रकृति है और बीज देने वाला पिता मैं हूँ।
जैसे एक परिवार में माता और पिता दोनों मिलकर संतान को जन्म देते हैं, वैसे ही इस सम्पूर्ण जगत की रचना प्रकृति (माता) और परमात्मा (पिता) के संयोग से होती है।
यह बहुत सुंदर बात है कि भगवान स्वयं को सब प्राणियों का पिता बताते हैं। इसका अर्थ है कि हर प्राणी — छोटा हो या बड़ा — भगवान की संतान है।