📿 श्लोक संग्रह

सर्वयोनिषु कौन्तेय

गीता 14.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
सर्वयोनिषु
सब योनियों में
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
मूर्तयः
शरीर/रूप
सम्भवन्ति
उत्पन्न होते हैं
याः
जो
तासाम्
उन सबकी
ब्रह्म महत्
महान प्रकृति
योनिः
माता/गर्भस्थान
अहम्
मैं
बीजप्रदः
बीज देने वाला
पिता
पिता

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन, सब योनियों में जितने भी शरीर उत्पन्न होते हैं — चाहे मनुष्य हों, पशु हों, पक्षी हों या कीट — उन सबकी माता प्रकृति है और बीज देने वाला पिता मैं हूँ।

जैसे एक परिवार में माता और पिता दोनों मिलकर संतान को जन्म देते हैं, वैसे ही इस सम्पूर्ण जगत की रचना प्रकृति (माता) और परमात्मा (पिता) के संयोग से होती है।

यह बहुत सुंदर बात है कि भगवान स्वयं को सब प्राणियों का पिता बताते हैं। इसका अर्थ है कि हर प्राणी — छोटा हो या बड़ा — भगवान की संतान है।

यह श्लोक पिछले श्लोक (14.3) की बात को पूरा करता है। वहाँ सृष्टि की प्रक्रिया बताई गई थी, यहाँ उस प्रक्रिया में भगवान की भूमिका स्पष्ट की गई है — वे बीजप्रद पिता हैं।

यही भाव गीता 9.17 में भी आता है जहाँ भगवान कहते हैं — "पिताहमस्य जगतो माता"।

अध्याय 14 · 4 / 27
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