भगवान कहते हैं कि महान प्रकृति (महद् ब्रह्म) मेरी योनि (गर्भस्थान) है। मैं उसमें चेतना-रूपी बीज स्थापित करता हूँ। हे अर्जुन, उसी से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
इसे ऐसे समझो — जैसे खेत में किसान बीज बोता है और फिर अनेक प्रकार की फसलें उगती हैं, वैसे ही भगवान प्रकृति-रूपी खेत में चेतना का बीज डालते हैं, और उससे सम्पूर्ण जीव-सृष्टि पैदा होती है।
यहाँ "महद् ब्रह्म" का अर्थ परब्रह्म नहीं, बल्कि मूल प्रकृति है — वह जड़ तत्त्व जिसमें सत्त्व, रजस् और तमस् तीनों गुण समाहित हैं।