📿 श्लोक संग्रह

मम योनिर्महद्ब्रह्म

गीता 14.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
मम
मेरी
योनिः
गर्भस्थान
महद् ब्रह्म
महान प्रकृति
तस्मिन्
उसमें
गर्भम्
बीज
दधामि
स्थापित करता हूँ
अहम्
मैं
सम्भवः
उत्पत्ति
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों की
ततः
उससे
भवति
होती है
भारत
हे अर्जुन

भगवान कहते हैं कि महान प्रकृति (महद् ब्रह्म) मेरी योनि (गर्भस्थान) है। मैं उसमें चेतना-रूपी बीज स्थापित करता हूँ। हे अर्जुन, उसी से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

इसे ऐसे समझो — जैसे खेत में किसान बीज बोता है और फिर अनेक प्रकार की फसलें उगती हैं, वैसे ही भगवान प्रकृति-रूपी खेत में चेतना का बीज डालते हैं, और उससे सम्पूर्ण जीव-सृष्टि पैदा होती है।

यहाँ "महद् ब्रह्म" का अर्थ परब्रह्म नहीं, बल्कि मूल प्रकृति है — वह जड़ तत्त्व जिसमें सत्त्व, रजस् और तमस् तीनों गुण समाहित हैं।

यह श्लोक सृष्टि-रचना का मूल सिद्धान्त बताता है — प्रकृति (जड़) और पुरुष (चेतन) के संयोग से सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है। यह सांख्य दर्शन का मूलभूत विचार है जिसे गीता ने अपनाया है।

अगले श्लोक में भगवान इसी बात को और स्पष्ट करते हैं कि सब योनियों में जो भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी माता प्रकृति है और पिता भगवान हैं।

अध्याय 14 · 3 / 27
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