📿 श्लोक संग्रह

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य

गीता 14.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥
इदम्
इस
ज्ञानम्
ज्ञान को
उपाश्रित्य
आश्रय लेकर
मम
मेरे
साधर्म्यम्
स्वरूप को
आगताः
प्राप्त हुए
सर्गे
सृष्टि में
न उपजायन्ते
जन्म नहीं लेते
प्रलये
प्रलय में
न व्यथन्ति
व्यथित नहीं होते

भगवान कहते हैं कि जो लोग इस ज्ञान का सहारा लेते हैं, वे मेरे स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। फिर न तो सृष्टि के समय उनका पुनः जन्म होता है और न ही प्रलय के समय वे दुखी होते हैं।

इसे ऐसे समझो — जब कोई बच्चा तैरना सीख लेता है, तो फिर उसे पानी से डर नहीं लगता। ठीक वैसे ही, जो यह ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसे संसार के जन्म-मृत्यु के चक्र से भय नहीं रहता।

"साधर्म्य" का अर्थ है समान धर्म — अर्थात् ऐसे ज्ञानी भगवान के समान गुणों को प्राप्त कर लेते हैं, जैसे शांति, आनंद और अविनाशित्व।

पहले श्लोक में भगवान ने कहा कि यह सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। अब इस श्लोक में वे बताते हैं कि इस ज्ञान का फल क्या है — जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति।

अध्याय 14 · 2 / 27
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