📿 श्लोक संग्रह

परं भूयः प्रवक्ष्यामि

गीता 14.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
श्रीभगवानुवाच — परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥
श्रीभगवानुवाच
भगवान बोले
परम्
श्रेष्ठ
भूयः
फिर से
प्रवक्ष्यामि
कहूँगा
ज्ञानानाम्
सब ज्ञानों में
ज्ञानम्
ज्ञान
उत्तमम्
सबसे उत्तम
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
मुनयः
मुनियों ने
सर्वे
सभी
पराम् सिद्धिम्
परम सिद्धि
इतः
इस संसार से
गताः
प्राप्त किए

चौदहवें अध्याय की शुरुआत में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं फिर से तुम्हें वह ज्ञान बताता हूँ जो सब ज्ञानों में सबसे श्रेष्ठ है। यह ज्ञान ऐसा है कि इसे जानकर सभी मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की।

इसे ऐसे समझो — जैसे किसी बड़े बुजुर्ग के पास बहुत सारी बातें होती हैं, पर एक बात सबसे मूल्यवान होती है जो वे बार-बार दोहराते हैं। भगवान भी यहाँ उसी सबसे मूल्यवान ज्ञान को दोबारा बता रहे हैं — प्रकृति के तीन गुणों का ज्ञान।

"भूयः" (फिर से) शब्द बताता है कि यह ज्ञान पहले भी कहा जा चुका है, पर इसकी महत्ता इतनी है कि इसे विस्तार से समझाना जरूरी है।

यह चौदहवें अध्याय "गुणत्रयविभागयोग" का पहला श्लोक है। तेरहवें अध्याय में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान बताने के बाद, अब भगवान प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व, रजस् और तमस् — की विस्तृत व्याख्या करने जा रहे हैं।

इस अध्याय का व्यावहारिक महत्व बहुत है क्योंकि यह बताता है कि हमारे स्वभाव, आदतें और कर्म इन्हीं तीन गुणों से बनते हैं।

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