भगवान कहते हैं — हे निष्पाप अर्जुन, इन तीन गुणों में सत्त्वगुण निर्मल (शुद्ध) होने के कारण प्रकाश देने वाला और रोगरहित है। परन्तु यह भी बाँधता है — सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से।
यह बहुत गहरी बात है। सत्त्वगुण अच्छा है — यह शांति, प्रकाश और ज्ञान लाता है। पर फिर भी यह बन्धन है। जैसे सोने की जंजीर भी जंजीर ही है, वैसे ही सात्त्विक सुख और ज्ञान में आसक्ति भी बन्धन है।
जो व्यक्ति सोचता है "मैं बहुत ज्ञानी हूँ" या "मैं बहुत सुखी हूँ" — वह भी बँधा हुआ है, भले ही उसका बन्धन सुंदर हो।