📿 श्लोक संग्रह

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि

गीता 14.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
तमः
तमोगुण
तु
परन्तु
अज्ञानजम्
अज्ञान से उत्पन्न
विद्धि
जानो
मोहनम्
मोह उत्पन्न करने वाला
सर्वदेहिनाम्
सब प्राणियों का
प्रमाद
लापरवाही
आलस्य
आलस
निद्राभिः
नींद से
तत्
वह
निबध्नाति
बाँधता है
भारत
हे भरतवंशी

भगवान कहते हैं — हे भरतवंशी, तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो। यह सब प्राणियों को मोह में डालता है। यह प्रमाद (लापरवाही), आलस्य और निद्रा (अत्यधिक नींद) से जीवात्मा को बाँधता है।

इसे ऐसे समझो — जब कोई व्यक्ति "कल करेंगे, अभी नहीं" सोचता रहता है, जब मन में उमंग नहीं उठती, जब बिना कारण भारीपन लगता है — तो यह तमोगुण का प्रभाव है।

तमोगुण से ग्रस्त व्यक्ति को न सही-गलत की समझ रहती है (अज्ञान), न कुछ करने का मन होता है (आलस्य), और न ही सावधानी रहती है (प्रमाद)।

इस श्लोक के साथ तीनों गुणों का परिचय पूरा हो गया — सत्त्व (14.6), रजस् (14.7) और तमस् (14.8)। अब आगे के श्लोकों में भगवान बताएँगे कि ये गुण कैसे काम करते हैं और एक-दूसरे पर कैसे प्रभाव डालते हैं।

अध्याय 14 · 8 / 27
← पिछला अध्याय 14 · 8 / 27 अगला →