भगवान कहते हैं — मैं ही ब्रह्म का आधार हूँ, अमृत (मोक्ष) का आश्रय हूँ, अविनाशी सनातन धर्म का और परम सुख का भी आश्रय मैं ही हूँ।
यह अध्याय का अंतिम और बहुत गंभीर श्लोक है। पिछले श्लोक में भगवान ने भक्ति को गुणातीत होने का उपाय बताया। अब वे बता रहे हैं कि भक्ति का लक्ष्य कौन है — वे स्वयं, जो ब्रह्म के भी आधार हैं।
"ऐकान्तिक सुख" — वह सुख जो केवल एक ही स्रोत से आता है, जो कभी बदलता नहीं, कभी समाप्त नहीं होता। संसार के सुख बदलते रहते हैं — कभी आते हैं, कभी जाते हैं। पर भगवान में स्थित सुख शाश्वत है।