📿 श्लोक संग्रह

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्

गीता 14.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥
ब्रह्मणः
ब्रह्म का
हि
निश्चय ही
प्रतिष्ठा
आधार/आश्रय
अहम्
मैं हूँ
अमृतस्य
अमृत (मोक्ष) का
अव्ययस्य
अविनाशी का
और
शाश्वतस्य
शाश्वत (सनातन) का
धर्मस्य
धर्म का
सुखस्य
सुख का
ऐकान्तिकस्य
परम/अनन्य

भगवान कहते हैं — मैं ही ब्रह्म का आधार हूँ, अमृत (मोक्ष) का आश्रय हूँ, अविनाशी सनातन धर्म का और परम सुख का भी आश्रय मैं ही हूँ।

यह अध्याय का अंतिम और बहुत गंभीर श्लोक है। पिछले श्लोक में भगवान ने भक्ति को गुणातीत होने का उपाय बताया। अब वे बता रहे हैं कि भक्ति का लक्ष्य कौन है — वे स्वयं, जो ब्रह्म के भी आधार हैं।

"ऐकान्तिक सुख" — वह सुख जो केवल एक ही स्रोत से आता है, जो कभी बदलता नहीं, कभी समाप्त नहीं होता। संसार के सुख बदलते रहते हैं — कभी आते हैं, कभी जाते हैं। पर भगवान में स्थित सुख शाश्वत है।

इस श्लोक के साथ चौदहवाँ अध्याय "गुणत्रयविभागयोग" पूर्ण होता है। इस अध्याय का सार यह है: प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) सब प्राणियों को बाँधे रखते हैं, परन्तु अनन्य भक्ति से इन गुणों को पार कर ब्रह्म-स्वरूप प्राप्त किया जा सकता है।

अगले अध्याय (15 — पुरुषोत्तमयोग) में भगवान संसार-वृक्ष और पुरुषोत्तम (परमात्मा) की व्याख्या करेंगे।

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