भगवान कहते हैं — सात्त्विक कर्म का फल निर्मल (शुद्ध, सुखदायी) होता है, राजसी कर्म का फल दुःख होता है, और तामसी कर्म का फल अज्ञान होता है।
इसे ऐसे समझो — जब कोई निःस्वार्थ सेवा करता है, तो उसे भीतर से शांति मिलती है (सात्त्विक फल)। जब कोई लालच या दिखावे के लिए काम करता है, तो अन्त में चिन्ता और दुःख ही मिलता है (राजसी फल)। और जब कोई अज्ञानवश गलत काम करता है, तो और गहरे अन्धकार में जाता है (तामसी फल)।