📿 श्लोक संग्रह

कर्मणः सुकृतस्याहुः

गीता 14.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥
कर्मणः
कर्म का
सुकृतस्य
सत्कर्म का
आहुः
कहते हैं
सात्त्विकम्
सात्त्विक
निर्मलम्
निर्मल/शुद्ध
फलम्
फल
रजसः
रजोगुण का
तु
परन्तु
फलम्
फल
दुःखम्
दुःख
अज्ञानम्
अज्ञान
तमसः फलम्
तमोगुण का फल

भगवान कहते हैं — सात्त्विक कर्म का फल निर्मल (शुद्ध, सुखदायी) होता है, राजसी कर्म का फल दुःख होता है, और तामसी कर्म का फल अज्ञान होता है।

इसे ऐसे समझो — जब कोई निःस्वार्थ सेवा करता है, तो उसे भीतर से शांति मिलती है (सात्त्विक फल)। जब कोई लालच या दिखावे के लिए काम करता है, तो अन्त में चिन्ता और दुःख ही मिलता है (राजसी फल)। और जब कोई अज्ञानवश गलत काम करता है, तो और गहरे अन्धकार में जाता है (तामसी फल)।

यह श्लोक कर्मफल को गुणों से जोड़ता है। अगले श्लोक (14.17) में बताया जाएगा कि गुणों से क्या-क्या उत्पन्न होता है — ज्ञान, लोभ, प्रमाद आदि।

गीता 18वें अध्याय में भी कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख — सबका सात्त्विक, राजसी और तामसी विभाजन किया गया है।

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