📿 श्लोक संग्रह

रजसि प्रलयं गत्वा

गीता 14.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥
रजसि
रजोगुण में
प्रलयं गत्वा
मृत्यु को प्राप्त होकर
कर्मसङ्गिषु
कर्मासक्त लोगों में
जायते
जन्म लेता है
तथा
वैसे ही
प्रलीनः
मरा हुआ
तमसि
तमोगुण में
मूढयोनिषु
मूढ़ योनियों में
जायते
जन्म लेता है

भगवान कहते हैं — रजोगुण की प्रधानता में मरने वाला कर्मासक्त लोगों में जन्म लेता है, और तमोगुण की प्रधानता में मरने वाला मूढ़ योनियों (जिनमें विवेक कम होता है) में जन्म लेता है।

इसे ऐसे समझो — जो व्यक्ति जीवन भर भागदौड़ और इच्छाओं में लगा रहता है, मृत्यु के समय भी उसका मन अधूरे कामों में उलझा रहता है — वह फिर ऐसे ही व्यस्त परिवार में जन्म लेता है। और जो आलस्य, अज्ञान और मोह में डूबा रहता है, उसकी अगली गति और भी जड़ होती है।

पिछले श्लोक में सात्त्विक मृत्यु का शुभ फल बताया गया था। यहाँ राजसी और तामसी मृत्यु के फल बताए गए हैं।

यह श्लोक मनुष्य को सत्त्वगुण बढ़ाने की प्रेरणा देता है। मृत्यु-समय का गुण अगले जन्म को निर्धारित करता है — यही बात गीता 8.6 में भी कही गई है: "यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्"।

अध्याय 14 · 15 / 27
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