📿 श्लोक संग्रह

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु

गीता 14.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥
यदा
जब
सत्त्वे
सत्त्वगुण में
प्रवृद्धे
बढ़े हुए
तु
तो
प्रलयम्
मृत्यु को
याति
प्राप्त होता है
देहभृत्
शरीरधारी
तदा
तब
उत्तमविदाम्
उत्तम ज्ञानियों के
लोकान्
लोकों को
अमलान्
निर्मल
प्रतिपद्यते
प्राप्त करता है

भगवान कहते हैं — जब सत्त्वगुण की प्रधानता में शरीरधारी की मृत्यु होती है, तब वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त करता है।

इसे ऐसे समझो — मृत्यु के समय मन की जो स्थिति होती है, वही अगले जन्म की दिशा तय करती है। जिसका अंतिम समय शांत, ज्ञानमय और सात्त्विक होता है, वह उत्तम लोकों में जाता है — जैसे ब्रह्मलोक या ऐसे स्थान जहाँ ज्ञानी जन निवास करते हैं।

"अमलान्" (निर्मल) शब्द बताता है कि ये लोक पाप और दुख से मुक्त हैं।

अब भगवान बता रहे हैं कि गुणों का प्रभाव केवल जीवन में ही नहीं, मृत्यु के बाद भी होता है। यह श्लोक सात्त्विक मृत्यु का फल बताता है। अगले दो श्लोकों (14.15-16) में राजसी और तामसी मृत्यु के फल बताए जाएँगे।

अध्याय 14 · 14 / 27
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