📿 श्लोक संग्रह

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च

गीता 14.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥
अप्रकाशः
अन्धकार/अज्ञान
अप्रवृत्तिः
निष्क्रियता
और
प्रमादः
लापरवाही
मोहः
भ्रम/मोह
एव च
भी
तमसि
तमोगुण के
एतानि
ये सब
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़ने पर
कुरुनन्दन
हे कुरुवंश के आनन्द

भगवान कहते हैं — हे कुरुनन्दन, जब तमोगुण बढ़ता है तब अन्धकार (विवेक का अभाव), निष्क्रियता (कुछ न करने की भावना), लापरवाही और मोह — ये सब उत्पन्न होते हैं।

इसे ऐसे समझो — जब कोई काम सामने हो पर करने का मन न हो, जब सोचने-समझने में मन न लगे, जब भूल-चूक बार-बार हो, और जब सही-गलत का भेद धुँधला हो जाए — तो यह तमोगुण की वृद्धि है।

ध्यान दें — "अप्रकाश" सत्त्व का विपरीत है, "अप्रवृत्ति" रजस् का विपरीत है। तमोगुण दोनों के विपरीत है — न प्रकाश है, न प्रवृत्ति।

इसके साथ तीनों गुणों की पहचान पूरी हो गई — सत्त्व (14.11 — प्रकाश, ज्ञान), रजस् (14.12 — लोभ, बेचैनी, सक्रियता) और तमस् (14.13 — अन्धकार, जड़ता, प्रमाद)। अब आगे के श्लोकों में मृत्यु-समय गुणों का प्रभाव बताया जाएगा।

अध्याय 14 · 13 / 27
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