भगवान कहते हैं — हे कुरुनन्दन, जब तमोगुण बढ़ता है तब अन्धकार (विवेक का अभाव), निष्क्रियता (कुछ न करने की भावना), लापरवाही और मोह — ये सब उत्पन्न होते हैं।
इसे ऐसे समझो — जब कोई काम सामने हो पर करने का मन न हो, जब सोचने-समझने में मन न लगे, जब भूल-चूक बार-बार हो, और जब सही-गलत का भेद धुँधला हो जाए — तो यह तमोगुण की वृद्धि है।
ध्यान दें — "अप्रकाश" सत्त्व का विपरीत है, "अप्रवृत्ति" रजस् का विपरीत है। तमोगुण दोनों के विपरीत है — न प्रकाश है, न प्रवृत्ति।