📿 श्लोक संग्रह

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः

गीता 14.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥
लोभः
लोभ/लालच
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति/सक्रियता
आरम्भः
नए कामों की शुरुआत
कर्मणाम्
कर्मों का
अशमः
अशांति/बेचैनी
स्पृहा
लालसा/इच्छा
रजसि
रजोगुण के
एतानि
ये सब
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़ने पर
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

भगवान कहते हैं — हे भरतश्रेष्ठ, जब रजोगुण बढ़ता है तब लोभ, प्रवृत्ति (कुछ करने की तीव्र इच्छा), नए-नए कामों की शुरुआत, बेचैनी और लालसा — ये सब उत्पन्न होते हैं।

इसे ऐसे समझो — जब मन में बहुत सारी योजनाएँ बनती हैं, एक काम पूरा होने से पहले दूसरा शुरू कर देते हैं, "मुझे और चाहिए" की भावना बार-बार आती है, और शांत बैठना मुश्किल लगता है — तो यह रजोगुण की वृद्धि है।

रजोगुण से भरा व्यक्ति बहुत सक्रिय तो होता है, पर उसके मन में सन्तोष नहीं होता। वह हमेशा कुछ-न-कुछ पाने की दौड़ में रहता है।

पिछले श्लोक में सत्त्वगुण की पहचान बताई गई — प्रकाश और ज्ञान। इस श्लोक में रजोगुण की पहचान बताई गई — लोभ, बेचैनी और अत्यधिक सक्रियता। अगले श्लोक में तमोगुण की पहचान होगी।

अध्याय 14 · 12 / 27
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