📿 श्लोक संग्रह

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्

गीता 14.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥
सर्वद्वारेषु
सब इन्द्रियों (द्वारों) में
देहे अस्मिन्
इस शरीर में
प्रकाशः
प्रकाश/चेतनता
उपजायते
उत्पन्न होता है
ज्ञानम्
ज्ञान
यदा
जब
तदा
तब
विद्यात्
जानना चाहिए
विवृद्धम्
बढ़ा हुआ
सत्त्वम्
सत्त्वगुण

भगवान कहते हैं — जब इस शरीर की सभी इन्द्रियों में प्रकाश (चेतनता, स्पष्टता) और ज्ञान उत्पन्न हो, तब समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

इसे ऐसे समझो — जब सुबह उठने पर मन हल्का लगे, सब कुछ साफ दिखे, विचार स्पष्ट हों, आँखों में चमक हो, कानों से सुना हुआ समझ में आए — तो यह सत्त्वगुण की वृद्धि का चिन्ह है। जैसे कमरे में दीपक जलाने से सब स्पष्ट दिखने लगता है, वैसे ही सत्त्वगुण बढ़ने पर मन में प्रकाश फैलता है।

यहाँ "द्वार" का अर्थ शरीर के छिद्र (इन्द्रियाँ) हैं — आँख, कान, नाक आदि। सत्त्व बढ़ने पर सभी इन्द्रियाँ सजग और स्पष्ट होती हैं।

श्लोक 14.10 में भगवान ने बताया कि गुण एक-दूसरे को दबाते रहते हैं। अब अगले तीन श्लोकों (14.11-13) में वे बता रहे हैं कि कौन-सा गुण प्रबल है, इसे कैसे पहचानें। यह श्लोक सत्त्वगुण की पहचान बताता है।

अध्याय 14 · 11 / 27
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