भगवान कहते हैं — हे भरतवंशी, कभी सत्त्वगुण रजस् और तमस् को दबाकर प्रबल हो जाता है, कभी रजोगुण सत्त्व और तमस् को दबाकर बढ़ता है, और कभी तमोगुण सत्त्व और रजस् को दबाकर हावी हो जाता है।
इसे ऐसे समझो — मन में तीनों गुण हमेशा रहते हैं, पर किसी एक समय एक गुण प्रबल होता है। जैसे आकाश में बादल आते-जाते रहते हैं — कभी धूप दिखती है, कभी बादल छा जाते हैं, कभी अँधेरा हो जाता है। ठीक वैसे ही मन में गुणों का उतार-चढ़ाव चलता रहता है।