📿 श्लोक संग्रह

रजस्तमश्चाभिभूय

गीता 14.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥
रजः
रजोगुण को
तमः च
और तमोगुण को
अभिभूय
दबाकर
सत्त्वम्
सत्त्वगुण
भवति
प्रबल होता है
भारत
हे भरतवंशी
रजः
रजोगुण
सत्त्वं तमः च
सत्त्व और तमस् को (दबाकर)
तमः
तमोगुण
सत्त्वं रजः तथा
सत्त्व और रजस् को (दबाकर)

भगवान कहते हैं — हे भरतवंशी, कभी सत्त्वगुण रजस् और तमस् को दबाकर प्रबल हो जाता है, कभी रजोगुण सत्त्व और तमस् को दबाकर बढ़ता है, और कभी तमोगुण सत्त्व और रजस् को दबाकर हावी हो जाता है।

इसे ऐसे समझो — मन में तीनों गुण हमेशा रहते हैं, पर किसी एक समय एक गुण प्रबल होता है। जैसे आकाश में बादल आते-जाते रहते हैं — कभी धूप दिखती है, कभी बादल छा जाते हैं, कभी अँधेरा हो जाता है। ठीक वैसे ही मन में गुणों का उतार-चढ़ाव चलता रहता है।

यह श्लोक बताता है कि गुणों का प्रभाव स्थिर नहीं रहता — वे एक-दूसरे को दबाते-उठाते रहते हैं। यह हमारे दैनिक अनुभव से मेल खाता है — सुबह ध्यान के बाद शांति (सत्त्व), दोपहर को व्यस्तता (रजस्), और रात को सुस्ती (तमस्)।

अगले श्लोकों (14.11-13) में भगवान बताएँगे कि कौन-सा गुण प्रबल है, यह कैसे पहचानें।

अध्याय 14 · 10 / 27
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