📿 श्लोक संग्रह

महाभूतान्यहंकारो

गीता 13.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
महाभूतानि
पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)
अहंकारः
अहंकार
बुद्धिः
बुद्धि
अव्यक्तम्
अव्यक्त प्रकृति
एव
ही
और
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
दश
दस
एकम्
एक (मन)
पञ्च
पाँच
इन्द्रियगोचराः
इन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)

इस श्लोक में क्षेत्र के अंगों की सूची दी गई है। पाँच महाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। फिर अहंकार — यानी 'मैं हूँ' की भावना। फिर बुद्धि। और अव्यक्त प्रकृति — यानी वह जड़ शक्ति जो दिखती नहीं पर सबके पीछे है।

इसके बाद दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ) और एक मन — ये ग्यारह। और पाँच इन्द्रिय-विषय — शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध। ये सब मिलकर इस शरीर-रूपी क्षेत्र का निर्माण करते हैं।

यह गणना सांख्य दर्शन की परंपरा से मेल खाती है जो भगवद्गीता में भी स्वीकार की गई है। पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि और मन — ये तत्त्वज्ञान के आधारभूत विभाग हैं।

गीता प्रेस पाठ में यह छठा श्लोक है। यह और सातवाँ श्लोक मिलकर क्षेत्र की पूरी सूची देते हैं।

अध्याय 13 · 6 / 34
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