इस श्लोक में क्षेत्र की सूची पूरी होती है। इच्छा और द्वेष, सुख और दुःख — ये सब भाव जो मन में उठते हैं, वे भी क्षेत्र के अंग हैं। शरीर का यह समुदाय, उसमें जो चेतना जान पड़ती है, और धैर्य-धारण की शक्ति — ये सब मिलाकर क्षेत्र है।
यह बात सोचने योग्य है — सुख और दुःख भी क्षेत्र हैं, आत्मा नहीं। जब हम समझते हैं कि 'दुःख मुझे हो रहा है' — तो यह शरीर-मन के स्तर की अनुभूति है। भीतर का साक्षी — क्षेत्रज्ञ — न सुखी होता है, न दुःखी।