📿 श्लोक संग्रह

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखम्

गीता 13.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥
इच्छा
इच्छा
द्वेषः
द्वेष, घृणा
सुखम्
सुख
दुःखम्
दुःख
सङ्घातः
शरीर का समुदाय (देह-संघात)
चेतना
चेतना, चेतन-शक्ति
धृतिः
धैर्य, धारण-शक्ति
एतत्
यह सब
क्षेत्रम्
क्षेत्र
समासेन
संक्षेप में
सविकारम्
विकारों सहित
उदाहृतम्
कहा गया

इस श्लोक में क्षेत्र की सूची पूरी होती है। इच्छा और द्वेष, सुख और दुःख — ये सब भाव जो मन में उठते हैं, वे भी क्षेत्र के अंग हैं। शरीर का यह समुदाय, उसमें जो चेतना जान पड़ती है, और धैर्य-धारण की शक्ति — ये सब मिलाकर क्षेत्र है।

यह बात सोचने योग्य है — सुख और दुःख भी क्षेत्र हैं, आत्मा नहीं। जब हम समझते हैं कि 'दुःख मुझे हो रहा है' — तो यह शरीर-मन के स्तर की अनुभूति है। भीतर का साक्षी — क्षेत्रज्ञ — न सुखी होता है, न दुःखी।

छठे और सातवें श्लोक मिलकर क्षेत्र का संक्षिप्त वर्णन पूरा करते हैं। यह सांख्य और योग दोनों परंपराओं में प्रचलित वर्गीकरण है।

गीता प्रेस पाठ में यह सातवाँ श्लोक है। 'सविकारम्' पद महत्वपूर्ण है — क्षेत्र विकारशील है, बदलता रहता है; क्षेत्रज्ञ नहीं बदलता।

अध्याय 13 · 7 / 34
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