📿 श्लोक संग्रह

अमानित्वमदम्भित्वम्

गीता 13.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥
अमानित्वम्
मान न चाहना, विनम्रता
अदम्भित्वम्
दिखावा न करना
अहिंसा
किसी को न सताना
क्षान्तिः
क्षमाशीलता
आर्जवम्
सरलता, सीधापन
आचार्योपासनम्
गुरु की सेवा
शौचम्
पवित्रता
स्थैर्यम्
स्थिरता
आत्मविनिग्रहः
आत्म-संयम, इन्द्रियों पर नियंत्रण

यहाँ से ज्ञान के लक्षणों की एक लंबी सूची शुरू होती है जो 13.8 से 13.12 तक चलती है। पहले आते हैं — मान न चाहना, दिखावा न करना, किसी को न सताना, क्षमाशीलता और सरलता।

फिर गुरु की सेवा, मन और शरीर की पवित्रता, स्थिरता और अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण। ये गुण ज्ञान के द्वार हैं। जैसे जड़ों के बिना पेड़ नहीं टिकता, वैसे इन गुणों के बिना ज्ञान नहीं टिकता।

भगवद्गीता में ज्ञान को केवल जानकारी नहीं माना गया — यह एक जीवन-शैली है। इसलिए कृष्ण यहाँ बौद्धिक ज्ञान की नहीं, व्यावहारिक गुणों की सूची देते हैं।

गीता प्रेस पाठ में यह आठवाँ श्लोक है। यह और अगले चार श्लोक (13.9–13.12) मिलकर ज्ञान के बीस से अधिक लक्षण देते हैं।

अध्याय 13 · 8 / 34
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