ज्ञान का अगला लक्षण है — इन्द्रिय-विषयों में आसक्ति न रखना। जो चीज़ें आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा को अच्छी लगती हैं — उनमें बंध न जाना। और अहंकार — 'मैं बड़ा हूँ, मैं जानता हूँ' — इस भाव का न होना।
साथ ही जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और रोग में जो दुःख और दोष हैं, उन्हें देखते रहना — यह भी ज्ञान का लक्षण है। यह निराशा नहीं, यह सच्ची समझ है — कि संसार का जो रूप है, उसे जैसा है वैसा देखना।