📿 श्लोक संग्रह

असक्तिरनभिष्वङ्गः

गीता 13.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
असक्तिः
आसक्ति न होना
अनभिष्वङ्गः
ममता न रखना
पुत्रदारगृहादिषु
पुत्र, पत्नी, घर आदि में
नित्यम्
सदा
और
समचित्तत्वम्
समभाव, मन की समता
इष्ट
प्रिय
अनिष्ट
अप्रिय
उपपत्तिषु
प्राप्तियों में

यहाँ कृष्ण बहुत नाज़ुक बात कहते हैं। पुत्र में, पत्नी में, घर में — आसक्ति और ममता न रखना। यह रिश्ते छोड़ने की बात नहीं है। प्रेम करो, पर उसमें बंध मत जाओ।

और सुख आए या दुःख, जो इच्छित हो वह मिले या न मिले — मन सदा समान रहे। यह समचित्तता ज्ञान का एक और लक्षण है। जैसे झील का पानी तूफ़ान में भी गहरे में शांत रहता है।

यह श्लोक गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। कृष्ण ने यहाँ संसार छोड़ने को नहीं कहा — संसार में रहते हुए अनासक्त रहने को कहा।

गीता प्रेस पाठ में यह दसवाँ श्लोक है। 'अनभिष्वङ्ग' — ममता का न होना — और 'असक्ति' — आसक्ति का न होना — इन दोनों में सूक्ष्म अंतर है जो अनुभव से समझ आता है।

अध्याय 13 · 10 / 34
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