📿 श्लोक संग्रह

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च

गीता 13.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥
तत्
वह
क्षेत्रम्
क्षेत्र
यत्
जो
और
यादृक्
जैसा है
यद्विकारि
जिसके जो विकार हैं
यतः
जिससे
सः
वह (क्षेत्रज्ञ)
यः
जो है
यत्प्रभावः
जिसका जो प्रभाव है
समासेन
संक्षेप में
मे
मुझसे
शृणु
सुनो

यहाँ कृष्ण कहते हैं — वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसके कौन-से विकार हैं, वह किससे उत्पन्न हुआ — और वह क्षेत्रज्ञ कौन है, उसका क्या प्रभाव है — यह सब मैं संक्षेप में बताता हूँ, सुनो।

यह श्लोक एक प्रस्तावना है। जैसे कोई बड़ा-बुजुर्ग कहे — 'बैठो, मैं तुम्हें एक-एक बात समझाता हूँ' — उसी तरह कृष्ण यहाँ अर्जुन को तैयार करते हैं।

भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय में यह चौथा श्लोक है। इसके बाद कृष्ण विस्तार से बताएंगे कि क्षेत्र किन-किन तत्वों से बना है।

गीता प्रेस पाठ में इस श्लोक के आगे पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि आदि की सूची आती है जो क्षेत्र के अंग हैं।

अध्याय 13 · 4 / 34
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