📿 श्लोक संग्रह

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि

गीता 13.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥
क्षेत्रज्ञम्
क्षेत्र के जानने वाले को
और
अपि
भी
माम्
मुझे
विद्धि
जानो
सर्वक्षेत्रेषु
सब क्षेत्रों (शरीरों) में
भारत
हे भरतवंशी (अर्जुन)
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का
ज्ञानम्
ज्ञान
यत्
जो
तत्
वह
मतम्
सम्मति, मत
मम
मेरा

यह श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है। भगवान कृष्ण कहते हैं — हर शरीर में जो जाननेवाला है, जो भीतर का साक्षी है — वह मैं हूँ। सिर्फ़ तुम्हारे शरीर में नहीं, सब जीवों के शरीर में।

एक दीपक की लौ जब लाखों दर्पणों में दिखती है, तो हर दर्पण में एक ही प्रकाश है। उसी तरह एक ही चेतन तत्व — परमात्मा — सब प्राणियों में क्षेत्रज्ञ के रूप में विद्यमान है।

और जो इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को समझ लेता है — वही सच्चा ज्ञान है, ऐसा कृष्ण का मत है।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने अपने स्वरूप को क्षेत्रज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया है। यह अद्वैत और विशिष्टाद्वैत दोनों परंपराओं में महत्वपूर्ण श्लोक माना जाता रहा है।

गीता प्रेस पाठ में यह तेरहवें अध्याय का तीसरा श्लोक है। अगले श्लोकों में कृष्ण यह बताएंगे कि क्षेत्र क्या-क्या है और ज्ञान का स्वरूप क्या है।

अध्याय 13 · 3 / 34
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