📿 श्लोक संग्रह

समं सर्वेषु भूतेषु

गीता 13.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥
समम्
समान रूप से
सर्वेषु
सब
भूतेषु
प्राणियों में
तिष्ठन्तम्
स्थित
परमेश्वरम्
परमेश्वर को
विनश्यत्सु
नाशवान (प्राणियों) में
अविनश्यन्तम्
अविनाशी को
यः
जो
पश्यति
देखता है
सः
वह
पश्यति
सच में देखता है

इस श्लोक में एक बहुत सुंदर बात कही गई है — 'यः पश्यति स पश्यति' — जो देखता है, वही सच में देखता है। और क्या देखता है? सब प्राणियों में समान रूप से बैठे हुए परमेश्वर को।

शरीर नाशवान हैं — हर प्राणी का शरीर एक दिन समाप्त होगा। लेकिन उन नाशवान शरीरों में जो अविनाशी परमात्मा बैठा है — उसे देखना ही सच्चा देखना है। बाक़ी सब देखना तो आँखों का काम है, लेकिन यह देखना ज्ञान की आँख से होता है।

जैसे अलग-अलग दीयों में एक ही तेल से लौ जलती है — बाहर से दीये अलग-अलग हैं लेकिन भीतर वही एक ज्योति है — वैसे ही अलग-अलग प्राणियों में वही एक परमात्मा विराजमान है। जो यह देख ले, उसे फिर किसी से भेद नहीं रहता।

यह श्लोक गीता के तेरहवें अध्याय से है जहाँ क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) का विभाग बताया गया है। इस अध्याय में कृष्ण प्रकृति और पुरुष, शरीर और आत्मा के भेद को स्पष्ट करते हैं।

यह श्लोक गीता 5.18 (विद्याविनयसम्पन्ने) के साथ मिलकर पढ़ा जाता है — दोनों समदर्शन की शिक्षा देते हैं।

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