इस श्लोक में एक बहुत सुंदर बात कही गई है — 'यः पश्यति स पश्यति' — जो देखता है, वही सच में देखता है। और क्या देखता है? सब प्राणियों में समान रूप से बैठे हुए परमेश्वर को।
शरीर नाशवान हैं — हर प्राणी का शरीर एक दिन समाप्त होगा। लेकिन उन नाशवान शरीरों में जो अविनाशी परमात्मा बैठा है — उसे देखना ही सच्चा देखना है। बाक़ी सब देखना तो आँखों का काम है, लेकिन यह देखना ज्ञान की आँख से होता है।
जैसे अलग-अलग दीयों में एक ही तेल से लौ जलती है — बाहर से दीये अलग-अलग हैं लेकिन भीतर वही एक ज्योति है — वैसे ही अलग-अलग प्राणियों में वही एक परमात्मा विराजमान है। जो यह देख ले, उसे फिर किसी से भेद नहीं रहता।