📿 श्लोक संग्रह

प्रकृत्यैव च कर्माणि

गीता 13.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥
प्रकृत्या
प्रकृति द्वारा
एव
ही
और
कर्माणि
कर्म
क्रियमाणानि
किए जाते हैं
सर्वशः
सब प्रकार से
यः
जो
पश्यति
देखता है
तथा
और उसी प्रकार
आत्मानम्
आत्मा को
अकर्तारम्
अकर्ता (कर्म न करने वाला)
सः
वह
पश्यति
सच में देखता है

यहाँ कृष्ण एक गहरी बात कहते हैं — जो यह देखता है कि सब कर्म प्रकृति ही करती है और आत्मा वास्तव में अकर्ता है — वही सच में देखने वाला है।

जैसे नदी का पानी बहता है — पानी नहीं चाहता, नदी की ढलान और गुरुत्व उसे बहाते हैं। उसी तरह शरीर के कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं। आत्मा साक्षी है, करने वाली नहीं।

यह अकर्तृत्व का विचार गीता 3.27 ('प्रकृतेः क्रियमाणानि') में भी आया था। वहाँ भी कृष्ण ने कहा था कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं।

गीता प्रेस पाठ में यह उन्तीसवाँ श्लोक है। यह और अगले तीन श्लोक अध्याय के अंतिम और सबसे गहरे दर्शन हैं।

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