यहाँ कृष्ण एक गहरी बात कहते हैं — जो यह देखता है कि सब कर्म प्रकृति ही करती है और आत्मा वास्तव में अकर्ता है — वही सच में देखने वाला है।
जैसे नदी का पानी बहता है — पानी नहीं चाहता, नदी की ढलान और गुरुत्व उसे बहाते हैं। उसी तरह शरीर के कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं। आत्मा साक्षी है, करने वाली नहीं।