📿 श्लोक संग्रह

अन्ये त्वेवमजानन्तः

गीता 13.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥
अन्ये
दूसरे लोग
तु
परंतु
एवम्
इस प्रकार
अजानन्तः
न जानते हुए
श्रुत्वा
सुनकर
अन्येभ्यः
दूसरों से
उपासते
उपासना करते हैं
ते
वे
अपि
भी
और
अतितरन्ति
पार हो जाते हैं
एव
निश्चय ही
मृत्युम्
मृत्यु को
श्रुतिपरायणाः
सुनने के प्रति समर्पित

यह श्लोक बहुत कोमल और आश्वस्त करने वाला है। जो लोग ध्यान नहीं कर सकते, जो गहरे दर्शन नहीं जानते — वे भी अगर दूसरों से सुनकर, श्रद्धा से उपासना करें — वे भी मृत्यु से पार हो जाते हैं।

यह उन सबके लिए है जो कहते हैं — 'मुझे तो इतना गहरा पता नहीं।' कृष्ण कह रहे हैं — कोई बात नहीं। जो जानता हो उससे सुनो, श्रद्धा रखो — यही पर्याप्त है।

यह श्लोक भक्ति-मार्ग की सरलता को दर्शाता है। श्रवण — सुनना — भक्ति के नवधा स्वरूप में पहला अंग है। गीता यहाँ उसे एक स्वतंत्र मोक्ष-मार्ग मान रही है।

गीता प्रेस पाठ में यह छब्बीसवाँ श्लोक है। अगला श्लोक (13.27) एक और दृष्टि देता है — हर प्राणी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग है।

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