📿 श्लोक संग्रह

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति

गीता 13.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥
ध्यानेन
ध्यान से
आत्मनि
आत्मा में
पश्यन्ति
देखते हैं
केचित्
कुछ लोग
आत्मानम्
आत्मा को
आत्मना
अपने मन से, स्वयं से
अन्ये
दूसरे
साङ्ख्येन योगेन
सांख्य-योग से
कर्मयोगेन
कर्मयोग से
और
अपरे
अन्य लोग

कृष्ण यहाँ बहुत उदार बात कहते हैं। सब एक ही मंज़िल पर पहुँचते हैं, पर रास्ते अलग हो सकते हैं। कुछ लोग ध्यान से — मन को एकाग्र करके — आत्मा का दर्शन करते हैं।

दूसरे सांख्य-योग से — विवेक और विचार से। और कुछ कर्मयोग से — कर्तव्य-कर्म में ही परमात्मा को देखते हुए। तीनों मार्ग मान्य हैं। जो जिस स्वभाव का हो, वह वैसे चले।

यह श्लोक गीता की सबसे उदार शिक्षाओं में से एक है। मोक्ष-मार्ग एक ही नहीं — ध्यान, ज्ञान, कर्म — सब वैध हैं। यह समन्वय की दृष्टि भगवद्गीता की विशेषता है।

गीता प्रेस पाठ में यह पच्चीसवाँ श्लोक है। अगला श्लोक (13.26) एक और मार्ग बताएगा — जो न ध्यान कर सकते हैं, न विचार, वे क्या करें।

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