📿 श्लोक संग्रह

य एवं वेत्ति पुरुषम्

गीता 13.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥
यः
जो
एवम्
इस प्रकार
वेत्ति
जानता है
पुरुषम्
पुरुष को
प्रकृतिम्
प्रकृति को
और
गुणैः सह
गुणों सहित
सर्वथा
सब प्रकार से
वर्तमानः
रहते हुए भी
अपि
भी
नहीं
सः
वह
भूयः
फिर
अभिजायते
जन्म लेता है

यह श्लोक इस पूरे खंड का फल बताता है। जो इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को जान लेता है — वह किसी भी अवस्था में रहते हुए — चाहे गृहस्थ हो, चाहे साधु — फिर जन्म नहीं लेता।

'सर्वथा वर्तमानः' — किसी भी प्रकार से जीवन जी रहा हो — यह पद बहुत महत्वपूर्ण है। ज्ञान का यह फल किसी एक विशेष जीवन-शैली से बँधा नहीं है।

यह श्लोक ज्ञान-मार्ग का मोक्ष-फल स्पष्ट करता है। पुरुष और प्रकृति का विवेक — यानी आत्मा को प्रकृति से अलग देख पाना — यही मुक्ति का द्वार है।

गीता प्रेस पाठ में यह चौबीसवाँ श्लोक है। अगले दो श्लोकों (13.25–13.26) में विभिन्न साधना-मार्गों की बात आती है।

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