📿 श्लोक संग्रह

इदं शरीरं कौन्तेय

गीता 13.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
इदम्
यह
शरीरम्
शरीर
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
क्षेत्रम्
क्षेत्र
इति
ऐसे
अभिधीयते
कहा जाता है
एतत्
इसे
यः
जो
वेत्ति
जानता है
तम्
उसे
प्राहुः
कहते हैं
क्षेत्रज्ञः
क्षेत्र का जानने वाला
तद्विदः
इस विषय के जानकार

भगवान कृष्ण कहते हैं — हे कुन्तीपुत्र, इस शरीर को 'क्षेत्र' कहते हैं। जैसे एक किसान का खेत होता है — उसमें बीज बोए जाते हैं, फ़सल उगती है — वैसे ही यह शरीर एक खेत है जिसमें कर्म, भाव और संस्कार बोए जाते हैं।

और जो इस खेत को जानता है — जो देखता है कि 'यह शरीर मैं हूँ लेकिन शरीर ही मैं नहीं हूँ' — उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं। यह जानकार भीतर का साक्षी है, शरीर का नहीं।

भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण पहले अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हैं। इस श्लोक से उत्तर आरंभ होता है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का यह भेद भारतीय दर्शन का एक मूल विचार है।

ज्ञान के जिज्ञासु इस पहले भेद को समझ लेते हैं तो आगे के श्लोक स्वयं खुलते चले जाते हैं। शरीर अस्थायी है — उसे जानने वाला चेतन तत्व स्थायी है — यही इस श्लोक का सार है।

अध्याय 13 · 2 / 34
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