भगवान कृष्ण कहते हैं — हे कुन्तीपुत्र, इस शरीर को 'क्षेत्र' कहते हैं। जैसे एक किसान का खेत होता है — उसमें बीज बोए जाते हैं, फ़सल उगती है — वैसे ही यह शरीर एक खेत है जिसमें कर्म, भाव और संस्कार बोए जाते हैं।
और जो इस खेत को जानता है — जो देखता है कि 'यह शरीर मैं हूँ लेकिन शरीर ही मैं नहीं हूँ' — उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं। यह जानकार भीतर का साक्षी है, शरीर का नहीं।