📿 श्लोक संग्रह

प्रकृतिं पुरुषं चैव

गीता 13.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
प्रकृतिम्
प्रकृति को
पुरुषम्
पुरुष को
और
एव
ही
क्षेत्रम्
क्षेत्र (शरीर) को
क्षेत्रज्ञम्
क्षेत्र के जानने वाले को
एतत्
यह सब
वेदितुम्
जानना
इच्छामि
चाहता हूँ
ज्ञानम्
ज्ञान को
ज्ञेयम्
जानने योग्य वस्तु को
केशव
हे केशव (कृष्ण)

तेरहवाँ अध्याय अर्जुन के एक सरल प्रश्न से शुरू होता है। वे कहते हैं — हे केशव, मैं जानना चाहता हूँ कि प्रकृति क्या है और पुरुष क्या है। यह शरीर जिसे 'क्षेत्र' कहते हैं, वह क्या है? और इसे जानने वाला 'क्षेत्रज्ञ' कौन है? ज्ञान क्या है और जानने योग्य क्या है?

ये सब बड़े गहरे प्रश्न हैं। लेकिन अर्जुन ने इन्हें सीधे और विनम्रता से पूछा। जैसे एक बच्चा अपनी दादी से पूछे — 'दादी, मैं कौन हूँ?' — यह प्रश्न छोटा लगता है, पर इसका उत्तर बहुत गहरा है।

भगवान कृष्ण इसी प्रश्न का उत्तर पूरे तेरहवें अध्याय में देते हैं। यह श्लोक पूरे अध्याय का द्वार है।

भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय का नाम क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग है। 'क्षेत्र' अर्थात शरीर, और 'क्षेत्रज्ञ' अर्थात उसे जानने वाली आत्मा — इन दोनों का विवेक ही इस अध्याय का विषय है।

गीता प्रेस, गोरखपुर के पाठ के अनुसार यह श्लोक अर्जुन उवाच के रूप में है — अर्थात यह प्रश्न अर्जुन का है, उत्तर कृष्ण का आगे आएगा।

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