📿 श्लोक संग्रह

सर्वतः पाणिपादम्

गीता 13.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
सर्वतः
सब ओर से
पाणिपादम्
हाथ और पाँव वाला
तत्
वह (ब्रह्म)
अक्षिशिरोमुखम्
आँख, सिर और मुख वाला
श्रुतिमत्
कान वाला
लोके
संसार में
सर्वम्
सबको
आवृत्य
ढककर, व्याप्त होकर
तिष्ठति
स्थित है

यह श्लोक बहुत काव्यात्मक है। कृष्ण कहते हैं — उस ब्रह्म के हाथ-पाँव सब ओर हैं, आँखें-सिर-मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं — और वह सारे संसार को व्याप्त करके स्थित है।

इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म का कोई शरीर है। इसका अर्थ है — जहाँ भी कोई हाथ काम कर रहा है, वहाँ ब्रह्म की शक्ति है। जहाँ भी कोई आँख देख रही है, वहाँ ब्रह्म की चेतना है। वह सब जगह है — किसी एक जगह नहीं।

यह वर्णन श्वेताश्वतरोपनिषद (3.16) की शैली से मेल खाता है जहाँ भी इसी प्रकार का सर्वव्यापकता-वर्णन आता है।

गीता प्रेस पाठ में यह चौदहवाँ श्लोक है। यह और अगले तीन श्लोक (13.15–13.17) मिलकर ब्रह्म के विरोधाभासी स्वरूप का चित्र खींचते हैं।

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