यह श्लोक बहुत काव्यात्मक है। कृष्ण कहते हैं — उस ब्रह्म के हाथ-पाँव सब ओर हैं, आँखें-सिर-मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं — और वह सारे संसार को व्याप्त करके स्थित है।
इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म का कोई शरीर है। इसका अर्थ है — जहाँ भी कोई हाथ काम कर रहा है, वहाँ ब्रह्म की शक्ति है। जहाँ भी कोई आँख देख रही है, वहाँ ब्रह्म की चेतना है। वह सब जगह है — किसी एक जगह नहीं।