📿 श्लोक संग्रह

सर्वेन्द्रियगुणाभासम्

गीता 13.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासम्
सब इन्द्रियों के गुणों से प्रकाशित
सर्वेन्द्रियविवर्जितम्
सब इन्द्रियों से रहित
असक्तम्
अनासक्त
सर्वभृत्
सबका पालन करने वाला
और
एव
ही
निर्गुणम्
गुणरहित
गुणभोक्तृ
गुणों का भोक्ता

यह श्लोक जोड़ों में विरोधाभास देता है। सब इन्द्रियों के गुणों से चमकता है — फिर भी सब इन्द्रियों से रहित है। सबका पालन करता है — फिर भी अनासक्त है। निर्गुण है — फिर भी गुणों का भोक्ता है।

यह विरोधाभास बताता है कि ब्रह्म को साधारण तर्क से नहीं समझा जा सकता। जैसे सूरज की रोशनी से सब दिखता है, पर सूरज खुद हर चीज़ में नहीं है — कुछ-कुछ वैसे ही ब्रह्म का संबंध जगत से है।

यह श्लोक ब्रह्म की परे-पार प्रकृति को व्यक्त करता है जो उपनिषद परंपरा का मूल विषय है। 'निर्गुण' और 'सगुण' के बीच यही संतुलन भारतीय दर्शन की विशेषता है।

गीता प्रेस पाठ में यह पंद्रहवाँ श्लोक है। इस श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर मन में एक विस्मय जागता है — यही इसका प्रयोजन है।

अध्याय 13 · 15 / 34
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