📿 श्लोक संग्रह

बहिरन्तश्च भूतानाम्

गीता 13.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥
बहिः
बाहर
अन्तः
भीतर
और
भूतानाम्
प्राणियों के
अचरम्
अचर (न चलने वाले) में
चरम्
चर (चलने वाले) में
एव
भी
सूक्ष्मत्वात्
सूक्ष्म होने के कारण
तत्
वह
अविज्ञेयम्
जाना नहीं जा सकता
दूरस्थम्
दूर स्थित
अन्तिके
पास में भी

वह ब्रह्म सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी। चर प्राणियों में भी, अचर — पेड़-पत्थर — में भी। इतना सूक्ष्म है कि इन्द्रियों से जाना नहीं जा सकता।

और दूर भी है, पास भी है। यह विरोधाभास नहीं है — जो वस्तु सर्वव्यापी हो, वह एक साथ सबसे दूर भी होती है और सबसे पास भी। जैसे वायु — हम उसे पकड़ नहीं सकते, पर वह हमारे भीतर ही चल रही है।

यह श्लोक ईशावास्योपनिषद (5) के 'तदेजति तन्नैजति, तद्दूरे तद्वन्तिके' से सीधा मेल खाता है — वह चलता है और नहीं चलता, वह दूर है और पास है।

गीता प्रेस पाठ में यह सोलहवाँ श्लोक है। 'सूक्ष्मत्वात् अविज्ञेयम्' — सूक्ष्म होने के कारण जाना नहीं जाता — यह पद तर्क की सीमा को दर्शाता है।

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