वह ब्रह्म सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी। चर प्राणियों में भी, अचर — पेड़-पत्थर — में भी। इतना सूक्ष्म है कि इन्द्रियों से जाना नहीं जा सकता।
और दूर भी है, पास भी है। यह विरोधाभास नहीं है — जो वस्तु सर्वव्यापी हो, वह एक साथ सबसे दूर भी होती है और सबसे पास भी। जैसे वायु — हम उसे पकड़ नहीं सकते, पर वह हमारे भीतर ही चल रही है।