📿 श्लोक संग्रह

मयि चानन्ययोगेन

गीता 13.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥
मयि
मुझमें
और
अनन्ययोगेन
अनन्य योग से, एकनिष्ठ होकर
भक्तिः
भक्ति
अव्यभिचारिणी
अटल, न डोलने वाली
विविक्तदेश
एकांत स्थान
सेवित्वम्
सेवन करना, रहना
अरतिः
अरुचि, न जमना
जनसंसदि
भीड़-भाड़ में

ज्ञान के और लक्षण हैं — मुझमें अटल भक्ति, जो कभी न डोले। और एकांत स्थान में रहने की रुचि। जहाँ शोर न हो, भीड़ न हो — वहाँ मन ठीक से सोच सकता है, भीतर उतर सकता है।

भीड़-भाड़ और शोर में अरुचि — यह वैराग्य नहीं है, यह एकाग्रता की ज़रूरत है। एक बड़े लेखक की तरह जिसे अपना काम करने के लिए थोड़ी शांति चाहिए होती है।

इस श्लोक में भक्ति को ज्ञान के लक्षणों में रखा गया है — यह गीता की एक महत्वपूर्ण बात है। ज्ञान और भक्ति अलग नहीं हैं; सच्चे ज्ञानी की भक्ति स्वाभाविक और अटल होती है।

गीता प्रेस पाठ में यह ग्यारहवाँ श्लोक है। 'अव्यभिचारिणी भक्ति' का उल्लेख गीता 8.22 में भी मिलता है।

अध्याय 13 · 11 / 34
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