ज्ञान-लक्षणों की सूची का अंतिम श्लोक। आत्मविद्या में निरंतर लगे रहना — यानी यह प्रयास एक-दो बार नहीं, सदा चलता रहे। और तत्त्व का सच्चा दर्शन — चीज़ों को जैसी वे हैं वैसा देखना।
कृष्ण कहते हैं — यह सब ज्ञान है। और जो इससे उलटा है — अहंकार, आसक्ति, दिखावा — वह अज्ञान है। ज्ञान और अज्ञान की यह परिभाषा बहुत व्यावहारिक है — जानकारी नहीं, जीवन-गुण।