📿 श्लोक संग्रह

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्

गीता 13.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥
अध्यात्मज्ञान
आत्मविद्या
नित्यत्वम्
में निरंतर लगे रहना
तत्त्वज्ञान
तत्त्व के ज्ञान के
अर्थदर्शनम्
अर्थ को देखना
एतत्
यह सब
ज्ञानम्
ज्ञान
इति
ऐसा
प्रोक्तम्
कहा गया है
अज्ञानम्
अज्ञान
यत्
जो
अतः
इससे
अन्यथा
विपरीत है

ज्ञान-लक्षणों की सूची का अंतिम श्लोक। आत्मविद्या में निरंतर लगे रहना — यानी यह प्रयास एक-दो बार नहीं, सदा चलता रहे। और तत्त्व का सच्चा दर्शन — चीज़ों को जैसी वे हैं वैसा देखना।

कृष्ण कहते हैं — यह सब ज्ञान है। और जो इससे उलटा है — अहंकार, आसक्ति, दिखावा — वह अज्ञान है। ज्ञान और अज्ञान की यह परिभाषा बहुत व्यावहारिक है — जानकारी नहीं, जीवन-गुण।

13.8 से 13.12 तक का यह पाँच-श्लोक खंड भगवद्गीता में ज्ञान की सबसे विस्तृत व्यावहारिक परिभाषा है। यहाँ ज्ञान को बीस से अधिक गुणों के रूप में वर्णित किया गया है।

गीता प्रेस पाठ में यह बारहवाँ श्लोक है। अगले श्लोक (13.13) से 'ज्ञेय' — जानने योग्य परब्रह्म — का वर्णन आरंभ होता है।

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